Monday, June 1, 2015

गर्मी से बचाये यह पहाड़ी रसीला फल " काफल "

गर्मी से बचाये यह पहाड़ी रसीला फल " काफल "

यूं तो गर्मियों के मौसम को हमने चिलचिलाती धूप, पसीने, उमस के लिए जाना है, लेकिन ईश्वर ने हमें इनसे बचने के लिए आम, बेल, तरबूज एवं खरबूज जैसे विभिन्न फल भी दिए हैं। ठीक इसी प्रकार हिमालयी क्षेत्र में भी "काफल" नाम से जाना जाने वाला एक फल अनायास ही अपनी ओर हमारा ध्यान खींचता है। काफल के पेड़ काफी बड़े होते हैं,ये पेड़ ठण्डी छायादार जगहों में होते हैं। हिमाचल से लेकर गढ़वाल, कुमाऊं व नेपाल में इसके वृक्ष बहुतायत में पाए जाते हैं।
इसका छोटा गुठली युक्त बेरी जैसा फल गुच्छों में आता है, जब यह कच्चा रहता है तो हरा दिखता है और पकने पर इसमें थोड़ी लालिमा आ जाती है। इसका खट्टा-मीठा स्वाद बहुत मनभावन और उदर-विकारों में बहुत लाभकारी होता है। पर्वतीय क्षेत्रों में मजबूत अर्थतंत्र दे सकने की क्षमता रखने वाला "काफल" नाम से जाना जाता है, यह पेड़ अनेक प्राकृतिक औषधीय गुणों से भरपूर है।


दातून बनाने से लेकर, अन्य चिकित्सकीय कार्यों में इसकी छाल का उपयोग सदियों से होता रहा है। इसके अतिरिक्त इसके तेल व चूर्ण को भी अनेक औषधियों के रूप में उपयोग किया जाता रहा है। आयुर्वेद में इसके अनेक चिकित्सकीय उपयोग बनाए गए हैं। बहुधा यह पेड़ अपने प्राकृतिक ढंग से ही उगता आया है। माना जाता है कि चिड़ियों व अन्य पशु-पक्षियों के आवागमन व बीजों के संचरण से ही इसके पौधे तैयार होते हैं और सुरक्षित होने पर एक बड़े वृक्ष का रूप लेते हैं। आयुर्वेद में इसे "कायफल" के नाम से जाना जाता है।

इसकी छाल में मायरीसीटीन, माय्रीसीट्रिन एवं ग्लायकोसाईड पाया जाता है। मेघालय में इसे "सोह-फी " के नाम से जाना जाता है और आदिवासी लोग पारंपरिक चिकित्सा में इसका प्रयोग वर्षों से करते आ रहे हैं। विभिन्न शोध इसके फलों में एंटी-आॅक्सीडेंट गुणों के होने की पुष्टि करते हैं, जिनसे शरीर में आक्सीडेटिव तनाव कम होता और दिल सहित कैंसर एवं स्ट्रोक के होने की संभावना कम हो जाती है। इसके फलों में पाए जाने वाले फायटोकेमिकल पोलीफेनोल सूजन कम करने सहित जीवाणु एवं विषाणुरोधी प्रभाव के लिए जाने जाते हैं। 


"काफल" को भूख की अचूक दवा माना जाता है। मधुमेह के रोगियों के लिए भी इसका सेवन काफी लाभदायक है। 

No comments:

Post a Comment